शाहजहांपुर ( धीरेन्द्र गुप्ता) प्रशासन की लापरवाही एवं भूमाफियाओं की सक्रियता के चलते कस्बे स्थित 28 मीटर चौडी एवं करीब आठ किलोमीटर लम्बी गैर मुमकिन नदी अब मात्र कुछ फिट का नाला ही रह गई है। मजे की बात ये रही की प्रशासन ने मामले को लेकर कोई कार्रवाई करने के स्थान पर अब्दुल रहमान फैसले को आधार मान इस नदी के पेटे को ही 40 खसरो मे विभाजित करते हुऐ इसे चारागाह मे तब्दील कर दिया। सरकारी आंकड़ों की माने तो कस्बे के राजस्व रिकॉर्ड मे ये नदी 441( 2.35 हेक्टेयर), 447 ( 1.23 हेक्टेयर) एवं 1218 ( 1.05 हेक्टेयर) खसरा नम्बर पर अंकित है जिसका कुल क्षेत्रफल 4.63 हेक्टेयर है । मानचित्र मे दर्ज गैर मुमकिन नदी पेटे की बात करे तो ये नदी 28 मीटर चौड़ी एवं अकेले शाहजहांपुर रकबे मे इसकी लम्बाई 1360 मीटर है। इसका उदगम कालेश्वर पहाड है। कालेश्वर पहाड से वाया ढोढाकरी होते हुऐ ये नदी 52 बीघा रकबे मे फैले रायसर तलाब को भरती हुई रेवाड़ी तक करीब दो दर्जन से अधिक जलाशयों को जलापूर्ति करती थी। अंतिम बार ये नदी 2006 मे आई थी एवं उसी समय रायसर तलाब पूरी तरह से लबालब हुआ था लेकिन लगातार अतिक्रमण, हाईवे निर्माण एवं आवासन मण्डल द्वारा नदी पेटे के बीच मे ही सडक बना देने के कारण विगत 14 वर्षों से इस नदी मे पानी नहीं आया है। जिसका फायदा उठा करीब एक दर्जन से अधिक भूमाफियाओं ने नदी पेटे को काट काट अपने खेतों मे मिला लिया है वही कुछ हिस्से को आवासन मण्डल द्वारा अपनी प्रस्तावित आवास योजना मे अवैध रुप से मिला लिया है। आलम ये है की आज 28 मीटर चौडी ( 92.4) फिट ये नदी मात्र आठ से दस फिट चौडा नाला बनकर रह गई है। इतना ही नहीं इस नदी पेटे मे करीब पचास से अधिक घुमंतू बंजारा परिवारों ने भी पक्के मकान बना अतिक्रमण कर लिया है। चुकी ये नदी गैर मुमकिन है ऐसे मे यहां घुमंतू बंजारों की रिहायश अवैध है। डूब क्षेत्र मे होने के कारण भारी वर्षा मे नदी के आने पर बढते खतरे को लेकर प्रशासन भी मौन साधे हुऐ है।
क्या होता है गैर मुमकिन…
गैर मुमकिन का अर्थ काश्त यानि खेती के अयोग्य जमीन को कहते हैं। इस जमीन पर खेती नहीं की जा सकती है ना ही किसी तरह की कोई रिहायश और ना ही इसकी खरीद-फरोख्त की जा सकती है। गैर मुमकिन रास्ते भी जमीन की रिकार्ड में अलग से काटे जाते थे और गांवों में खेतों तक पहुंचने के लिए सभी लोगों के उपयोग के लिए ये रास्ते होते थे।
जमीनों के बढते दामों ने काश्तकारों एवं प्रशासन का बिगाडा जमीर..
नदी पेटे मे काश्तकारों एवं बंजारों के अतिक्रमण को लेकर अनेकों बार शिकायते दर्ज करवाई गई लेकिन आज तक प्रशासन ने कार्रवाई तो दूर मौके पर जाकर हालात तक देखना वाजिब नहीं समझा है। अकेले शाहजहांपुर मे इस गैर मुमकिन नदी का रकबा काग़जो के अनुसार 4.63 हेक्टेयर है वही अकेले शाहजहांपुर की सीमा मे ये नदी 1360 मीटर लम्बी है जबकी मौके पर ये नदी अब अपना पूराना अस्तित्व खोकर मात्र आठ से दस फिट ही रह गई है। 2006 मे एकाएक जमीनों के दामों के भारी उछाल मे ये नदी भूमाफियाओं की नजर मे आ गई । हाईवे से सीधे तौर पर जुडी इस नदी को भूमाफिया लगातर निगलते रहे लेकिन जानकारी के बाद भी प्रशासन मौन साधे रहा।



हाई कोर्ट के फैसले को भी दिखाया ठेंगा.. राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जनहित याचिका ‘अब्दुल रहमान बनाम सरकार’ में 2 अगस्त 2004 को आदेश पारित किया था। हाईकोर्ट के आदेश से एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी जिससे राज्य के जल स्रोतों व जलागम क्षेत्रों की स्थिति व सुधार के सुझाव मांगे गए थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट दी थी उसमें जलागम क्षेत्रों के कैचमेंट एरिया में हुए अतिक्रमण को हटाने व इनमें बरसाती पानी की आवक के लिए 15 अगस्त 1947 की स्थिति बहाल करने का सुझाव देते हुए रिपोर्ट दी थी। इस विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार को जलागम क्षेत्रों को उनके मूल स्वरूप मे स्थापित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए थे। यह भी आदेश दिए थे कि कैचमेंट एरिया में हुए अतिक्रमणों को हटाने के लिए पुख्ता कदम उठाए जाएं। इसके बाद सरकारी तंत्र सक्रिय हुआ और राज्य के सभी जिलों के नदी, तालाबों, नालों समेत प्रमुख जल स्रोतों की सुध ली गई और इनके कैचमेंट एरिया का रिकार्ड खंगाला गया। कैचमेंट एरिया में आने वाली जमीनों के खातेदार व निर्माण करने वालों को नोटिस जारी हुए और जमीनें सरकारी खाते में दर्ज करने के लिए लगभग आठ हजार से ज्यादा मुकदमे रेफरेंस के रूप में राजस्व मंडल में दायर हुए। लेकिन शाहजहांपुर नदी को लेकर प्रशासन मौन साधे रहा। नदी नालों सहित कस्बे के रायसर एवं नारेहडा तलाब पर जमकर अतिक्रमण हुआ लेकिन इसे हटाना तो दूर प्रशासन ने अतिक्रमण करने वालों को नॉटिस तक भी नहीं दिया।
क्या कहते है जिम्मेदार….
मामला गंभीर है। सरकारी जमीन,नदी, नाले, कैचमेंट एरिया पर अतिक्रमण नहीं हो सकता। इसमे मै अपने तहसीलदार को निर्देशित करता हूं । मामले मे 91 मे पटवारी एवं कानुनगो की रिपोर्ट लेकर तहसीलदार अतिक्रमित क्षेत्र की पैमाईश करे एवं अतिक्रमण हटवाये।
योगेश देवल
एसडीएम नीमराना
मामला गंभीर है। नदी, नाले, तलाब या बहाव क्षेत्र पर अतिक्रमण कर हमने अपने पर्यावरण एवं पीढ़ी दोनों को ही प्रभावित किया है। मै मामले से सम्बंधित अधिकारियों से बात कर नदी पेटे से अतिक्रमण हटवाने का प्रयास करुंगा।
मंजीत धर्मपाल चौधरी
विधायक मुण्डावर



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